बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण से मनाही कर रहे थे बच्चे, एमपी हाईकोर्ट ने लगा दी फटकार, सुनाया ये फैसला

भोपाल: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि माता-पिता ने अपनी संपत्ति बच्चों को दी है या नहीं, इससे यह तय नहीं होता कि बच्चे उनका ध्यान रखेंगे या नहीं। भले ही माता-पिता ने अपनी संपत्ति बच्चों को न दी हो, फिर भी बच्चों का कर्तव्य बनता है कि वो अपने माता-पिता की देखभाल करें।

माता-पिता का भरण पोषण बच्चों का कर्तव्य

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि माता-पिता को गुजारा भत्ता देने का सवाल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उन्होंने बच्चों को कितनी संपत्ति दी है। कोर्ट ने आगे कहा कि बच्चों का कर्तव्य है कि वे अपने माता-पिता का भरण पोषण करें। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए बेटे को आदेश दिया कि वह अपनी मां को 8000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता दे। अदालत ने महिला के चारों बच्चों को दो-दो हजार रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।

इस नियम के तहत लिया निर्णय

न्यायालय ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून बुजुर्ग माता-पिता को उनके बच्चों द्वारा परित्यक्त और उपेक्षित होने से बचाने के लिए बनाया गया है।

बेटे की दलील पर कोर्ट की फटकार

बेटे ने अपनी दलील में कहा था कि उसकी मां ने उसे कोई संपत्ति नहीं दी है, इसलिए वह उसका भरण-पोषण करने के लिए बाध्य नहीं है। इस पर हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि माता-पिता का कर्तव्य निभाना बच्चों की नैतिक जिम्मेदारी है। हाई कोर्ट के जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया है। उन्होंने साफ किया कि अगर याचिकाकर्ता अपने माता-पिता के द्वारा संपत्ति के असमान बंटवारे से व्यथित है तो उसके पास अलग से सिविल मुकदमा दायर करने का विकल्प है। वह अपने माता-पिता का भरण पोषण करने के दायित्व से दूर नहीं भाग सकता।

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