970 सालों से गणपति बप्पा की एक जैसी मूर्ति, पांढुर्ना के इस मठ में गणेशोत्सव पर होती है अनोखी परंपरा, जानें

छिंदवाड़ा: मध्य प्रदेश के पांढुर्ना के सबसे पुराने मठ में 970 सालों से चली आ रही परंपरा के अनुसार गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस खास मौके पर मठ में भगवान गणेश की विशेष प्रतिमा स्थापित की गई है। खास बात यह है कि सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार इस मूर्ति का आकार, बनावट और यहां तक कि वस्त्र भी हर साल एक समान रहते हैं।

हर दिन पहनाए जाते हैं रेशमी वस्त्र

मठ में स्थापित गणेश प्रतिमा की एक और विशेषता है। परंपरा के अनुसार, हर साल भगवान गणेश के माथे और हाथों में शिवलिंग स्थापित किया जाता है। इसके अलावा हर दिन विशेष सजावट की जाती है। भगवान को नए रेशमी वस्त्र पहनाए जाते हैं।

चार पीढ़ियों से जोशी परिवार कर रहा पूजा

मठ में पूजा-अर्चना का जिम्मा पंडित नंदकिशोर जोशी के पास है। जोशी परिवार पिछली चार पीढ़ियों से इस मंदिर में गणेश जी की पूजा-अर्चना करता आ रहा है। इतना ही नहीं मूर्तिकार एन. खोड़े भी कई सालों से परंपरागत तरीके से गणेश प्रतिमा का निर्माण कर रहे हैं।

पहले दिन लगता है पूरणपोली का भोग

गणेशोत्सव के दौरान भगवान गणेश को विभिन्न प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। पहले दिन पूरणपोली और करंजी का भोग लगाया जाता है। इसके बाद हर दिन अलग-अलग प्रकार का भोग लगाया जाता है। एकादशी के दिन फलों का भोग लगाया जाता है।

क्या बोले मठाधिपति

मठाधिपति वीररूद्रमुनी शिवाचार्य स्वामी महाराज के अनुसार यह मठ मध्यप्रदेश में कर्नाटक के श्री वीरशैव लिंगायत मठ संस्थान रंभापुरी शाखा का एकमात्र मठ है। उन्होंने आगे बताया कि परंपरा अनुसार 970 वर्षों से श्रीगणेश की स्थापना और पूजन के प्रमाण यहां मौजूद हैं।

गणेशोत्सव के दौरान भक्तों का लगता है तांता

गणेशोत्सव के दौरान, भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। लोगों की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद भगवान गणेश पूरी करते हैं। इस अवसर पर आयोजित होने वाले गणेशोत्सव में श्री वीरशैव लिंगायत समाज और युवा संगठन का विशेष सहयोग रहता है। पूरे देश से लोग यहां दर्शन करने आते हैं।

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