पुलिस होटल में घुसी..हाईकोर्ट ने 1 लाख का जुर्माना ठोका

बिलासपुर, दुर्ग जिले के एक होटल में पुलिस ने जबरदस्ती घुसकर जांच की। पुलिस अधिकारी एक गुमशुदा लड़की की तलाश में पहुंचे थे। उन्होंने पहले मैनेजर से बदतमीजी की फिर होटल के कमरे में घुसकर वहां मौजूद महिला-पुरुष को बाहर निकाला। मना करने पर पुलिस ने होटल मालिक से मारपीट की और बिना FIR जेल भेज दिया।

जिसके बाद पीड़ित ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। दायर याचिका में बताया गया कि होटल मेंं रुके लोगों ने वैध दस्तावेज आधार कार्ड दिए थे, तो पुलिस कार्रवाई से पहले अनुमति लेनी थी। लेकिन पुलिस ने जबरदस्ती कार्रवाई की।

हाईकोर्ट ने मालिक की गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए पुलिस पर 1 लाख का जुर्माना ठोका है। साथ ही सरकार को छूट दी है कि जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों के सैलरी से ये पैसे वसूल सकती है।

कारोबारी ने अपनी गिरफ्तारी को अवैध बताया

दरअसल, भिलाई के अवंतीबाई चौक निवासी आकाश कुमार साहू (30 साल) लॉ के स्टूडेंट है। इसके साथ ही वे परिवार के भरण-पोषण और आजीविका के लिए कोहका में होटल संचालित करते है।

आकाश साहू ने अपने एडवोकेट के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने पुलिस की अवैध कार्रवाई व अपनी गिरफ्तारी को अवैध बताया।

याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता विधिवत पंजीकृत और लाइसेंस लेकर होटल चला रहा है। जिसके लिए सभी आवश्यक वैधानिक अनुमति ली है। यह होटल उसकी आय का एकमात्र जरिया है और यह उसकी आजीविका के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

होटल के कमरे में जबरदस्ती घुसी पुलिस

होटल संचालक ने आरोप लगाया कि 8 सितंबर 2025 को पुलिस अधिकारी व जवान उनके होटल में पहुंचे। इस दौरान होटल में ठहरे लोगों से पूछताछ करने का बहाना बनाया गया। इस दौरान रजिस्टर और पहचान दस्तावेजों की जांच की।

जिसके बाद बगैर महिला पुलिस बल के एक कमरे में जबरदस्ती घूस गए, जहां पुरूष और महिला ठहरे थे। उन्हें कमरे से बाहर लाया गया। इस दौरान मैनेजर के साथ दुर्व्यवहार किया गया।

साथ ही उन्हें बेवजह धमकी देकर चले गए। फिर कुछ समय बाद पुलिस अफसर व जवान फिर से होटल पहुंच गए।

इस दौरान होटल कर्मचारियों द्वारा सोने के आभूषणों की चोरी का झूठा आरोप लगाया। इस पर पुलिस अधिकारियों को कर्मचारियों ने होटल परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की जानकारी दी और जांच करने कहा।

लेकिन, पुलिस अफसर जांच करने के बजाय कमरों की तलाशी लेने पहुंच गए। उन्होंने कथित तौर पर होटल मैनेजर की बेहरमी से पिटाई की। जिसके बाद होटल मालिक को बुलाया गया।

संचालक के साथ दुर्व्यवहार, बिना FIR गिरफ्तारी

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जब वो होटल पहुंचा तो उसने पुलिस अफसरों को संस्थान के मालिक होने की जानकारी दी। इतना सुनते ही पुलिस अफसर भड़क गए और उसके साथ गाली-गलौज करते हुए दुर्व्यवहार कर अपमानित करने लगे।

उसके विरोध करने पर उसे जबरिया हिरासत में लेकर थाने ले जाया गया, जहां उसके साथ मारपीट कर अभद्रता की गई। फिर बाद में बिना किसी वैध कारण के गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

पुलिस का जवाब- गुमशुदा लड़की की तलाश में गए थे

वहीं, पुलिस अफसरों का कहना था कि 8 सितंबर 2025 को पुलिस एक गुमशुदा लड़की की तलाश में उनके होटल पहुंची थी। जिस पर कमरों की तलाशी ली गई। पुलिस ने दावा किया कि आकाश ने सरकारी काम में बाधा डाली।

पुलिस वाहन की चाबी छीन ली और ड्राइवर के साथ हाथापाई की, जिससे शांति भंग होने का खतरा पैदा हो गया था । इसी आधार पर पुलिस ने उन्हें बीएनएस की धारा 170 के तहत हिरासत में ले लिया और बाद में जेल भेज दिया।

हाईकोर्ट ने माना बिना FIR के भेजा जेल

इस मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी संज्ञेय अपराध के तहत कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी। महज संदेह और कहासुनी के आधार पर जेल भेजना असंवैधानिक है।

हिरासत में दिया गया मानसिक तनाव और अपमान मानवीय गरिमा को नष्ट करता है, जो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। कानून के मुताबिक गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित में कारण बताना अनिवार्य है। बता दें कि आकाश ने गिरफ्तारी मेमो पर खुद लिखा था कि मुझे मामले की जानकारी नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा- एसडीएम ने नहीं निभाया अपना धर्म

हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस के साथ ही एसडीएम यानी सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी होना चाहिए था, लेकिन उन्होंने बिना दिमाग लगाए पुलिस की रिपोर्ट पर मुहर लगा दी और युवक को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

हाईकोर्ट ने रद्द की आपराधिक कार्यवाही

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई सभी आपराधिक कार्यवाही और पुलिस के इस्तगासा को निरस्त कर दिया है। राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि 4 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपए का भुगतान करे।

सरकार को यह छूट दी है कि वह यह राशि जांच के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है। भुगतान में देरी होने पर राशि पर 9% वार्षिक ब्याज देना होगा।

‘जनता के विश्वास की नींव कमजोर होती है’

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि पुलिस अधिकारियों के अवैध कार्य, गैर कानूनी रिमांड और पुलिस अत्याचार से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास की नींव को कमजोर करते हैं।

ऐसी हर घटना कानून लागू करने वाली मशीनरी की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। साथ ही संवैधानिक शासन में नागरिकों के विश्वास को हिला देती है। इसलिए, राज्य सरकार को पुलिस कर्मियों को मानवाधिकारों के बारे में संवेदनशील बनाने के लिए गंभीर कदम उठाने चाहिए।

हाईकोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए ताकि भविष्य में ऐसी बर्बर घटनाएं रिपीट न हो।

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