इंसानी फेफड़ों पर सुअरों के वायरस का वार! म्यूटेशन से बढ़ी चिंता, भोपाल के वैज्ञानिक तैयार करेंगे सुरक्षा ढाल

भोपाल। पालतू सुअरों में पाया जाने वाला आंत्र और इंफ्लुएंजा वायरस इंसानी आबादी के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। कोरोना के बाद चौकन्ने हुए विज्ञानियों ने पाया है कि ये वायरस बार-बार अपना रूप बदल रहे हैं, यानी उनका म्यूटेशन हो रहा है। अब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान (निहसाद) इन खतरों से बचाने के लिए ढाल बनाएगा। इंसानी जान को जोखिम से बचाने के लिए ”इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च” (आइसीएमआर) के नेशनल वन हेल्थ मिशन के तहत निहसाद को दो बड़े और संवेदनशील शोध परियोजनाओं को अनुमति दी है।

इन परियोजनाओं का मुख्य काम यह समझना है कि सुअरों में बार-बार म्यूटेट (रूप बदलना) हो रहे ये वायरस किस हद तक इंसानों के फेफड़ों और आंतों को संक्रमित कर सकते हैं। विज्ञानियों की पहली टीम ”मानव-शूकर इंटरफेस” पर ध्यान केंद्रित करेगी। ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में सुअर आबादी और इंसानों का संपर्क बहुत करीब का होता है। शोध में यह देखा जाएगा कि जूनोटिक आंत्र वायरस का नया बदला हुआ वेरिएंट क्या इंसानों की कोशिकाओं में प्रवेश करने की शक्ति हासिल कर चुका है? यदि ऐसा होता है तो यह जानवरों से इंसानों में फैलने वाली एक नई संक्रामक बीमारी की शुरुआत हो सकती है।

दूसरे सर्वे में इन्फ्लुएंजा और वैक्सीन की रणनीति बनेगी

दूसरी परियोजना इन्फ्लुएंजा वायरस की विविधता और उसके जेनेटिक स्ट्रक्चर को समझने पर आधारित है। इन्फ्लुएंजा वायरस अपनी फितरत के लिए प्रचलित हो रहा है, ये बहुत तेजी से म्यूटेट होते हैं, जो घातक ”फ्लू” महामारी का कारण बनते हैं। निहसाद के विज्ञानी इन वायरसों की जेनेटिक मैपिंग तैयार करेंगे। इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वैक्सीन की तैयारी है। यदि वैज्ञानिकों को वायरस के बदलने के पैटर्न का पता चल जाता है, तो किसी भी बड़े प्रकोप से पहले ही प्रभावी वैक्सीन और सुरक्षा रणनीति तैयार कर ली जाएगी।

क्यों डरा रहा है म्यूटेशन?

निहसाद के विशेषज्ञों के अनुसार, जब कोई वायरस जानवरों से इंसानों में आता है, तो इंसानी शरीर का इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) उसे पहचान नहीं पाता। सुअरों में इन्फ्लुएंजा के म्यूटेशन का मतलब है कि वायरस खुद को और अधिक शक्तिशाली और संक्रामक बना रहा है। भोपाल की लैब में इन वायरसों का परीक्षण ”बायो सेफ्टी लेवल-तीन” के सुरक्षित वातावरण में किया जाएगा, ताकि संक्रमण की गहराई का सटीक अंदाजा लगाया जा सके।

इनका कहना है

दोनों परियोजनाएं बड़ी हैं। इसके लिए देशभर के अलग-अलग केंद्रों से सुअरों से नमूने भोपाल लाए जाएंगे। यहां संस्थान की हाई-टेक लैब में इनकी गहन टेस्टिंग की जाएगी। भविष्य में कोरोना जैसी किसी भी भयानक महामारी के खतरे से बचने के लिए यह शोध बेहद जरूरी है। – डा. फतह सिंह, वरिष्ठ विज्ञानी, निहसाद, भोपाल।

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