खाल उठाने के कारोबार से असलम को मिला ‘चमड़ा’ उपनाम

भोपाल, भोपाल में गोमांस तस्करी के आरोपों में घिरे असलम चमड़ा ने यू हीं कई सौ करोड़ रुपए का साम्राज्य खड़ा नहीं किया है। कई सफेदपोश लोगों से उसके करीबी रिश्ते रहे हैं। रसूखदारों के संरक्षण की बदौलत असलम मवेशियों की खाल के मामूली कारोबार से स्लॉटर हाउस संचालक, मृत मवेशियों को उठाने का ठेकेदार बना।

नगर निगम में असलम की धमक इतनी थी कि उसके अलावा स्लॉटर हाउस का टेंडर तक भरने की हिम्मत कोई नहीं करता था। असलम को जेल भेजे जाने के बाद पुलिस नगर निगम के अधिकारियों को तलब कर पूछताछ करेगी। करीब आधा दर्जन अधिकारियों को जल्द नोटिस जारी होंगे।

स्लॉटर का प्रस्ताव तैयार करने वाले नगर निगम के तत्कालीन अपर आयुक्त एनपी सिंह भी जांच के दायरे में हैं। पुलिस के पास टेंडर संबंधी जब्त दस्तावेजों में उनके भी साइन मिले हैं। इसी के साथ पुलिस असलम के कर्मचारियों और करीबियों को तलब करने की तैयारी में है।

ऐसे शुरू किया था असलम ने कारोबार असलम के करीबियों के मुताबिक 1988 में असलम कुरैशी उर्फ चमड़ा ने भोपाल के आसपास के जिले सीहोर, विदिशा, रायसेन और आष्टा आदि से स्वयं गांव-गांव घूमकर स्लॉटरिंग की गई भैंस की खालों को खरीदने का काम किया था।

लोडिंग वाहनों से इन खालों को भोपाल और यहां से बंगाल और उत्तरप्रदेश भेजा जाता था। मृत गाय उठाने का टेंडर मिलने के बाद असलम के दिन बदल गए। उसकी शानो शोकत और रसूख में भी बदलाव आने लगा।

इसके बाद असलम ने प्रॉपर्टी में इन्वेस्टमेंट करना शुरू किया। इसी के साथ नगर निगम के स्लॉटर हाउस का संचालन भी असलम ने अपने हाथ में लिया। असलम को स्लॉटर हाउस सौंपे जाने का विरोध खुद कुरैशी समाज ने किया था। इसे लेकर बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस की गई थी। इसमें असलम पर स्लॉटरिंग की एवज में तय शुल्क से ज्यादा वसूलने के आरोप लगे थे।

इन अधिकारियों से अब तक पूछताछ नहीं स्लॉटर हाउस के टेंडर से लेकर एमआईसी की मंजूरी तक की ज्यादातर फाइलों पर अधीक्षण यंत्री उदित गर्ग और कार्यपालन यंत्री आरके त्रिवेदी के साइन हैं, लेकिन अब तक इन दोनों से न तो पूछताछ हुई है और न ही इनकी भूमिका की औपचारिक जांच शुरू की गई है। इससे एसआईटी की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। 

असलम पर रोहिंग्या को बसाने के आरोप गोकशी के आरोपों में सील किए गए इस परिसर से जुड़े मामले में अब नया मोड़ आया है। स्लॉटर हाउस के संचालक असलम चमड़ा पर जिंसी की मक्का मस्जिद के पास रोहिंग्या को बसाने के आरोप हैं। पिछले साल इसकी शिकायत जोन-1 डीसीपी कार्यालय में की गई थी।

आरोप हैं कि उसने 250 रोहिंग्या बसाए हैं और उन्हीं से स्लॉट्रिंग व अन्य काम कराए जा रहे हैं। यहां तक की इन रोहिंग्या के फर्जी दस्तावेज भी भोपाल से असलम द्वारा बनवाए जा रहे हैं। हालांकि इस मामले की जांच में पुलिस ने असलम को क्लीन चिट दे दी थी।

खास बात यह है कि क्लीनचिट असलम के ही बयानों के आधार पर दी गई। भोपाल पुलिस ने जांच रिपोर्ट राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को भी सौंपी थी

पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल 30 अक्टूबर 2025 को सौंपी गई पुलिस रिपोर्ट में कहा गया कि शिकायतकर्ता का पता न होने के कारण उससे संपर्क नहीं हो सका और स्थानीय पूछताछ में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई। हालांकि, आयोग ने इस रिपोर्ट को सिरे से नकारते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।

आयोग ने स्पष्ट किया कि एक ओर रिपोर्ट में आरोपों को निराधार बताया गया है, वहीं दूसरी ओर असलम कुरैशी के बयान में यह स्वीकार किया गया है कि मजदूर पश्चिम बंगाल, असम और बिहार जैसे सीमावर्ती राज्यों से लाए जा रहे हैं और उनके रहने की व्यवस्था उसकी निजी संपत्ति में है।

जांच अधिकारी ने यह जांचने की जहमत नहीं उठाई कि इन मजदूरों के पास मौजूद पहचान पत्र असली हैं या नहीं और क्या उनकी मूल स्रोत से पुष्टि की गई है। आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता की तलाश के नाम पर पुलिस वास्तविक मुद्दे को ‘भ्रमित’ करने का प्रयास कर रही है।

एसआईटी ने असलम के रिमांड के दौरान क्या कुछ किया पुलिस ने शुक्रवार (22 जनवरी) को नगर निगम से स्लॉटर हाउस से जुड़ी फाइलें और दस्तावेज जब्त किए। इनमें साल 2014-15 से अब तक के टेंडर, अनुमति पत्र और अन्य रिकॉर्ड शामिल हैं।

प्रभारी सहायक यंत्री सौरभ सूद समेत दो कर्मचारियों को लगातार दो दिनों से जहांगीराबाद थाने बुलाकर पूछताछ की। शनिवार को असलम को प्राइवेट कार से स्लॉटर हाउस लेकर पहुंची थी पुलिस टीम।

अंदर करीब एक घंटे तक उससे पूरे कार्य के संबंध में जानकारी ली। रविवार को असलम को रिमांड खत्म होने के बाद जेल दाखिल कर दिया गया।

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