राजिम कुंभ में मुख्य मंच बना छत्तीसगढ़ी संस्कृति की नई पहचान

गरियाबंद। राजिम कुंभ कल्प मेला के दूसरे दिन मुख्य मंच पर छत्तीसगढ़ी संस्कृति की भव्य और मनोहारी छटा देखने को मिली। देश-प्रदेश से पहुंचे श्रद्धालुओं और दर्शकों के बीच प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने छत्तीसगढ़ की लोककला, शास्त्रीय नृत्य और परंपराओं को एक नई पहचान दी। कार्यक्रम की शुरुआत इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की पीएचडी शोधार्थी सुश्री लीली चौहान द्वारा प्रस्तुत कत्थक नृत्य से हुई। उन्होंने विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से कथक की भाव भंगिमाओं और मुद्राओं को मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी प्रस्तुति को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए और हर नृत्य शैली पर तालियों की गूंज सुनाई देती रही।  इसके पश्चात लोकप्रयाग मंच की झमाझम प्रस्तुतियों ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति से परिचय कराया। लोकप्रयाग के कलाकारों ने अपनी पहली प्रस्तुति में मां जगदंबा का स्मरण करते हुए “मोर दंतेश्वरी महामाई” गीत प्रस्तुत किया, जिससे दर्शकों को मंच से ही बस्तर स्थित मां दंतेश्वरी के दर्शन का अनुभव हुआ।

इसके बाद छत्तीसगढ़ के राजकीय गीत “अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार” की प्रस्तुति से जमकर सराहना मिली। कार्यक्रम की कड़ी में “आगे बड़ी माटी मोर भुइयां…” जैसे गीतों ने दर्शकों का ध्यान किसानों और मिट्टी से जुड़ी संस्कृति की ओर खींचा, वहीं प्रसिद्ध गीत “सॉस गारी दीहि…” ने एक बार फिर दर्शकों को अपने लोक-संगीत के जादू में बांध लिया। लोक कलाकारों ने विलुप्त हो रही लोकविधाओं जैसे बांसगीत और जय गंगान की प्रस्तुति से उन्हें पुनर्जीवित करने का सराहनीय प्रयास किया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में “मोर छत्तीसगढ़ हे महान, जिहां बसे राजिम धाम…” गीत की प्रस्तुति पर पूरा पंडाल राजिम की जय-जयकार से गूंज उठा। इसके साथ ही आदिवासी अंचलों में प्रचलित नृत्यों की प्रस्तुति पर दर्शक झूम उठे। कार्यक्रम के समापन पर सभी कलाकारों का सम्मान प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों द्वारा किया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button