बाबर: द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान के लेखक आभास भोपाल पहुंचे

भोपाल के भारत भवन में चल रहे भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल में हिस्सा लेने पहुंचे इतिहासकार और लेखक आभास मालधियार ने बातचीत में बाबर, राम मंदिर, ताजमहल और मुगलकाल से जुड़े कई विवादित सवालों पर खुलकर अपनी बात रखी। ‘Babur: The Quest for Hindustan’ के लेखक ने कहा कि बाबर को लेकर भारत में जो नरेटिव बनाया गया है, उसमें कई ऐतिहासिक तथ्य या तो अधूरे हैं या फिर गलत संदर्भ में पेश किए गए हैं।

ताजमहल के नीचे मंदिर की थ्योरी पर साफ इनकार

ताजमहल को लेकर समय-समय पर उठने वाले इस दावे पर कि उसके नीचे कोई मंदिर था, लेखक ने स्पष्ट शब्दों में असहमति जताई। उन्होंने कहा कि अब तक इस थ्योरी के समर्थन में कोई ठोस ऐतिहासिक या पुरातात्विक प्रमाण सामने नहीं आया है। मुगलकालीन दस्तावेज, फारसी रिकॉर्ड और विदेशी यात्रियों के विवरण ताजमहल के निर्माण को लेकर पर्याप्त जानकारी देते हैं, लेकिन इनमें कहीं भी मंदिर विध्वंस का उल्लेख नहीं मिलता। मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं। वह राजा मानसिंह का पैलेस था, इसके बाद ताज महल बना, उसका फाउंडेशन 6 महीने में बनकर तैयार हुआ, उसका फुटप्रिंट वाइट हाउस से आठ गुना बड़ा है, वाइट हाउस से, यह इतनी जल्दी कैसे बन गया। यह मानसिंह के पैलेस को हटाकर बनाया गया था।

राम मंदिर विध्वंस बाबर नहीं, औरंगजेब के दौर में हुआ

राम मंदिर विवाद पर आभास का कहना है कि उनकी शोध के अनुसार अयोध्या में मंदिर का विध्वंस बाबर के शासनकाल में नहीं हुआ। ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि 17वीं सदी के मध्य तक अयोध्या में राम मंदिर का अस्तित्व बना हुआ था। ब्रिटिश यात्रियों के विवरण, स्थानीय स्मृतियां और प्रशासनिक अभिलेख इस ओर संकेत करते हैं कि मंदिर 1660 के बाद तक मौजूद था। लेखक के मुताबिक अकबर कालीन इतिहासकार अबुल फजल ने अपने ग्रंथ आइन-ए-अकबरी में अयोध्या में रामनवमी उत्सव का उल्लेख किया है, जो मंदिर के अस्तित्व की ओर इशारा करता है।

आभास बताते हैं कि 17वीं सदी के शुरुआती वर्षों में भारत आए अंग्रेज यात्री विलियम फिंच ने अयोध्या को ‘रामकोट’ बताते हुए वहां राम मंदिर का उल्लेख किया है। इसके बाद 1707 के आसपास भारत आए जेसुइट पादरी जोसेफ टिफेंथालर ने स्थानीय लोगों के हवाले से दर्ज किया कि मंदिर का विध्वंस औरंगजेब के शासनकाल में हुआ था। लेखक के अनुसार टिफेंथालर के विवरण में बाबर का नाम कहीं नहीं आता।

भोपाल वसीयतनामा को बताया फेक

बातचीत के दौरान आभास ने भोपाल से जुड़े तथाकथित ‘भोपाल वसीयतनामा’ पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह दस्तावेज ऐतिहासिक रूप से संदिग्ध है और इसके 19वीं सदी में गढ़े जाने के संकेत मिलते हैं। लेखक के अनुसार इस वसीयतनामे का उपयोग कई बार बाबर को धर्मनिरपेक्ष और हिंदू हितैषी साबित करने के लिए किया गया, जबकि इसकी भाषा और फारसी शैली मुगलकालीन दस्तावेजों से मेल नहीं खाती। उन्होंने यह भी बताया कि दस्तावेज पर अंकित मुहर और शब्दावली उस दौर की प्रशासनिक परंपरा के अनुरूप नहीं है। लेखक ने इसे इतिहास लेखन में की गई एक गंभीर चूक बताते हुए कहा कि बिना प्रामाणिकता जांचे ऐसे दस्तावेजों का बार-बार हवाला देना ऐतिहासिक विमर्श को भ्रमित करता है।

बाबर धार्मिक सहिष्णु नहीं, लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं

आभास ने यह भी कहा कि बाबर को धार्मिक सहिष्णु शासक के रूप में पेश करना गलत है। खानवा के युद्ध से पहले बाबर ने खुद को इस्लामी योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया, शराब छोड़ने की घोषणा की और धार्मिक प्रतीकों के विध्वंस की बात कही। हालांकि, इसके साथ ही बाबर एक कवि था, प्रकृति प्रेमी था और परिवार को महत्व देता था। आभास के अनुसार इतिहास का काम इन सभी पहलुओं को सामने रखना है, न कि सिर्फ सुविधा के अनुसार किसी एक चेहरे को उभारना।

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