रैबीज और स्क्रब टाइफस के वायरस पर नजर रखेगा भोपाल का गांधी चिकित्सा कॉलेज, सेंटिनल सर्विलांस साइट के रूप में हो रहा विकसित

भोपाल। राजधानी भोपाल के गांधी चिकित्सा महाविद्यालय (जीएमसी) की वायरोलॉजी लैब को अब भविष्य की महामारियों को रोकने के लिए पहरेदार (सेंटिनल सर्विलांस साइट) के रूप में विकसित किया जा रहा है।

केंद्र सरकार के ‘वन हेल्थ प्रोग्राम’ के तहत यहां विशेष केंद्र स्थापित किया गया है, जो रैबीज, स्क्रब टाइफस और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी उन बीमारियों की निगरानी करेगा जो जानवरों से मनुष्य में फैलती हैं।

पशु और मानव स्वास्थ्य के डेटा को साथ जोड़कर सटीक जांच

नई व्यवस्था के तहत ऐसे मरीजों के नमूनों की लैब में गहराई से जांच की जाएगी ताकि पता चल सके कि कोई नया वायरस तो नहीं पनप रहा। यह प्रयोगशाला अब पशु और मानव स्वास्थ्य के डेटा को एक साथ जोड़कर बीमारियों के जेनेटिक स्ट्रक्चर की सटीक जांच करेगी।

इससे भोपाल और आसपास के जिलों में संक्रमण और वायरस के बदलते पर स्वरूप के खतरों पर प्रभावी लगाम लगेगी। निगरानी केंद्र मुख्य रूप से उन चार बीमारियों पर फोकस करेगा जो भोपाल और आसपास के जिलों में पाई जाती हैं। दरअसल, देश भर में अलग-अलग वायरोलाजी लैब को अलग-अलग बीमारियों की निगरानी का काम सौंपा गया है।

इन बीमारियों पर रहेगी नजर

स्क्रब टाइफस: छोटे कीड़ों (माइट्स) से फैलने वाला जानलेवा बुखार। रैबीज: कुत्तों और जंगली जानवरों की लार से फैलने वाला घातक वायरस।

ब्रुसेलोसिस: पशुओं के सीधे संपर्क या दूषित डेयरी उत्पाद से होने वाला संक्रमण।

लेप्टोस्पायरोसिस: चूहों के जरिए और दूषित पानी से फैलने वाली बीमारी।

यह होगा फायदा

अभी तक प्रशासन बीमारी फैलने के बाद सक्रिय होता था, लेकिन यह सेंटर पहरेदार की तरह काम करेगा और क्षेत्र में इन बीमारियों के एक-दो संदिग्ध मरीज मिलते ही यह साइट अर्ली वार्निंग जारी कर देगी।

इससे स्वास्थ्य विभाग को मैदान में दवा छिड़काव, टीकाकरण या अन्य निरोधात्मक कदम उठाने का समय मिल जाएगा। इसके अलावा निजी लैब में होने वाली महंगी जांचों की सुविधा आम जनता को यहां निश्शुल्क मिलगी।

जीएमसी में सेंटिनल सर्विलांस साइट की स्थापना जूनोटिक बीमारियों के नियंत्रण के लिए की जा रही है। यहां से मिलने वाले सटीक डेटा के आधार पर हम भविष्य की महामारियों को रोकने के लिए ठोस रणनीति बना सकेंगे। जिससे जानवरों से इंसानों में पहुंचने वाले संक्रमण की पहचान शुरुआती स्तर पर ही कर ली जाए।

-डॉ. कविता एन. सिंह, डीन, गांधी मेडिकल कॉलेज

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