एक साल में भी हल नहीं हो सकी मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की शिकायतें, कई विभागों की 4.38 लाख शिकायतें अब भी लंबित

भोपाल। प्रदेश में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की शिकायतों के त्वरित और संतोषजनक निराकरण के सरकारी दावे एक बार फिर जमीन पर कमजोर साबित होते नजर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देशों के बावजूद वर्ष 2025 में भी शत-प्रतिशत शिकायतों का समाधान नहीं हो सका।

साल बीतने के साथ ही नए साल का एक महीना भी गुजर चुका है, लेकिन अब भी प्रदेश के 55 जिलों में विभिन्न विभागों की 4 लाख 38 हजार 929 शिकायतें लंबित हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसी है, जो 50 दिन से अधिक समय से अटकी हुई हैं। यह स्थिति प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

बार-बार बंद, फिर दोबारा शिकायत

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर आवेदक अपनी समस्याएं दर्ज कराते हैं। कई मामलों में शिकायतें औपचारिक रूप से बंद कर दी जाती हैं, लेकिन असंतुष्ट आवेदक दोबारा शिकायत दर्ज करा देते हैं। इससे लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। विभागीय स्तर पर समस्या के स्थायी समाधान की बजाय फाइलें बंद करने की प्रवृत्ति इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।

15 साल से न्याय का इंतजार

कोलार क्षेत्र के महाबली नगर निवासी प्रीति सक्सेना का मामला इस व्यवस्था की हकीकत उजागर करता है। उन्होंने वर्ष 2000 में रोहित गृह निर्माण सहकारी संस्था मर्यादित से भूखंड लिया था और 2001 व 2012 में कुल 4.39 लाख रुपये जमा किए। इसके बावजूद प्लाट की रजिस्ट्री नहीं हुई। वर्ष 2010 में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई, लेकिन 15 साल बीत जाने के बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिला। इस दौरान उन्होंने सहकारिता विभाग और कलेक्टर जनसुनवाई तक कई शिकायतें कीं, लेकिन समाधान नहीं हुआ। उल्टा शिकायत बंद करवाने के लिए कई बार फोन आते रहे।

विभागों में भी लंबित शिकायतों का अंबार

प्रदेश के विभिन्न विभागों में शिकायतों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन डैशबोर्ड के अनुसार कुल लंबित शिकायतें 4,38,929 हैं, जिनमें से 1,57,693 शिकायतें 50 दिन से अधिक समय से लंबित हैं। जनवरी में 3,34,010 शिकायतें प्राप्त हुईं, लेकिन संतुष्टि के साथ केवल 91,935 शिकायतें ही बंद हो सकीं। जनवरी में ही 2,42,075 शिकायतें लंबित रहीं, जो दर्शाता है कि नई शिकायतों की तुलना में समाधान की गति काफी धीमी है।

सबसे ज्यादा शिकायतें किन विभागों में

विभागवार आंकड़ों पर नजर डालें तो राजस्व विभाग में 93,140 शिकायतें लंबित हैं, जिनमें 47,884 मामले 50 दिन से अधिक पुराने हैं। गृह विभाग में 50,241 शिकायतें लंबित हैं, जबकि नगरीय विकास एवं आवास विभाग में 42,463 मामले अटके हुए हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में 61,444, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा में 33,648 और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में 18,950 शिकायतें लंबित हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि लगभग हर बड़े विभाग में शिकायतों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

जिलों में भी हालात चिंताजनक

जिलों की बात करें तो भोपाल में 20,603 शिकायतें लंबित हैं, जिनमें 9,701 मामले 50 दिन से अधिक पुराने हैं। इंदौर में 17,651, रीवा में 18,200, ग्वालियर में 14,962, जबलपुर में 13,597 और सागर में 11,939 शिकायतें लंबित हैं। बड़े शहरी जिलों में भी शिकायतों का समय पर समाधान नहीं होना प्रशासन की कार्यक्षमता पर सवाल उठाता है।

समाधान की बजाय आंकड़ों की बाजीगरी

विशेषज्ञों का मानना है कि शिकायतों को वास्तव में हल करने की बजाय उन्हें औपचारिक रूप से बंद करने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इससे न केवल शिकायतकर्ता असंतुष्ट रहते हैं, बल्कि व्यवस्था पर उनका भरोसा भी कमजोर होता है। मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का उद्देश्य आम नागरिकों को त्वरित न्याय दिलाना था, लेकिन मौजूदा हालात इस उद्देश्य से काफी दूर नजर आ रहे हैं।

जनता की उम्मीद और प्रशासन की चुनौती

अब देखना यह है कि सरकार और प्रशासन इस बढ़ती शिकायतों की संख्या पर कब और कैसे नियंत्रण पाते हैं। यदि विभागीय जवाबदेही तय नहीं की गई और शिकायतों के वास्तविक समाधान पर जोर नहीं दिया गया, तो मुख्यमंत्री हेल्पलाइन जैसी महत्वाकांक्षी योजना भी जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाएगी।

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