महारानी होकर भी साध्वी की तरह रहीं देवी अहिल्या:मस्जिदें तोड़े बिना कराया मंदिरों का निर्माण; 300 साल बाद भी मॉडल हैं फैसले

देवी अहिल्या बाई होलकर की 300वीं जयंती पर इंदौर में आज मंगलवार को डाॅ. मोहन यादव कैबिनेट की बैठक हो रही है। जिसका उद्देश्य उनके शासन काल के फैसले, नीतियों और सुशासन से लोगों को अवगत कराना है।
देवी अहिल्या बाई के शासन काल में राजस्व वसूली, पंचायतों को अधिकार, जनसुनवाई समेत ऐसे कई फैसले लिए गए, जो आज भी नजीर हैं। बिना टैक्स बढ़ाए राजस्व 75 लाख से सवा करोड़ रुपए तक पहुंचना अपने आप में मिसाल है। यही नहीं, वर्तमान सरकारों की नीतियों में शामिल सुशासन और महिला सशक्तिकरण भी उन्हीं की देन हैं।
आज हम देवी अहिल्या बाई के ऐसे ही फैसलों के बारे में बताएंगे, जिनकी बदौलत इंदौर राजाओं के नाम की जगह बहू के नाम से पहचाना जाने लगा…
महेश्वर को होलकर राज्य की राजधानी बनाया देवी अहिल्या बाई का जन्म 31 मई 1725 को औरंगाबाद जिले की बीड़ तालुका के चोंट गांव में हुआ था। 1735 में पिता मानको जी शिंदे ने इंदौर के राजा मल्हार राव होलकर के बेटे खांडेराव से अहिल्या बाई की शादी कराई। सास गौतमा बाई की मौत के कुछ सालों बाद पति खांडेराव की 1754 में भरतपुर (राजस्थान) के डींग के पास कुंभेर के किले में मौत हो गई।
ऐसे में ससुर मल्हार राव ने प्रथम महिला शासिका के रूप में देवी अहिल्या बाई होलकर को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उन्होंने महेश्वर को होलकर राज्य की राजधानी बनाया।
महारानी होने के बावजूद साध्वी की तरह रहीं सूबेदार मल्हार राव प्रथम के समय में अहिल्याबाई अधिकतर इंदौर में ही रहीं। ससुर और पति के रणक्षेत्र में व्यस्त होने पर वे राजकार्य भी करती थीं। युद्ध क्षेत्र में रसद और धन भेजा करती थीं। ससुर, पति और पुत्र की मृत्यु के बाद जब वे महारानी बनीं तो राजधानी को 1767 में महेश्वर ले गईं।
अहिल्या बाई होलकर विशाल राज्य का प्रशासन संभालते हुए भी साध्वी की तरह रहीं। सूर्योदय से पूर्व जागकर नर्मदा स्नान करती थीं। इसके बाद ‘कामधेनु’ नामक गाय का हल्दी, कुमकुम, फल-फूल से पूजन के बाद दीप-आरती करती थीं। दस्तावेजों से पता चलता है कि जिस दिन देवी अहिल्या ब्रह्मलीन हुईं, उसी दिन ‘कामधेनु’ गाय का भी निधन हो गया था।





