नेपाल में 90 करोड़ डॉलर झोंककर अमेरिका ने करवाया तख्तापलट? Gen Z आंदोलन की कैसे लिखी गई स्क्रिप्ट? उठे सवाल

काठमांडू/वॉशिंगटन: हिंसक प्रदर्शन के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार गिर गई। पिछले हफ्ते हुए प्रदर्शन में करीब 50 लोगों की मौत हुई, सैकड़ों इमारतों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया, देश की संसद और सुप्रीम कोर्ट तक को आग के हवाले कर दिया गया। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को लेकर नेपाल में प्रदर्शन शुरू हुआ था। इस साल मार्च में द संडे गार्जियन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि नेपाल में सत्ता परिवर्तन करने की कोशिश की जा रही है। नेपाल के कुछ नेताओं के नाम भी सामने आए थे, जिनपर कथित तौर पर सत्ता परिवर्तन की इस प्रक्रिया में हिस्सा होने का आरोप लगा था।

द संडे गार्जियन ने USAID के इंटरनल कम्युनिकेशन और अमेरिकी लोकतांत्रिक संगठनों की तरफ से प्रकाशित कार्यक्रम आउटपुट के हवाले से दावा किया है कि अमेरिका ने नेपाल में 900 मिलियन डॉलर झोंके हैं। डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि साल 2020 से नेपाल को 900 मिलियन डॉलर से ज्यादा की अमेरिकी सहायता दी गई है, जिसका ज्यादातर हिस्सा वाशिंगटन स्थित कंसोर्टियम सीईपीपीएस, नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट (NDI), इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट (IRI), और इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इलेक्टोरल सिस्टम्स (IFES) की तरफ से संचालित शासन, मीडिया, नागरिक और चुनावी गतिविधियों में लगाया गया है।

अमेरिका में लिखी गई सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट
नेपाल जैसे छोटे देश के लिए इतना ज्यादा वित्तीय मदद देना काफी असामान्य है। मई 2022 में USAID ने नेपाल के वित्त मंत्रालय के साथ 402.7 मिलियन डॉलर के डेवलपमेंट ऑब्जेक्टिव एग्रीमेंट (DOAG) पर हस्ताक्षर किए। फरवरी 2025 तक 158 मिलियन डॉलर पहले ही बांटे जा चुके थे और 244.7 मिलियन डॉलर अभी भी खर्च नहीं हुए हैं। इसके अलावा भी अलग से 500 मिलियन डॉलर का मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) समझौता, जिस पर 2017 में हस्ताक्षर किए गए थे और जिसे कड़े विरोध और संसदीय विवादों के बाद फरवरी 2022 में ही अनुमोदित किया गया था, वो अभी भी लागू है। 2025 की शुरुआत तक, MCC के सिर्फ 43.1 मिलियन डॉलर (8.63%) फंड वितरित किए गए थे, लेकिन समझौते की अवधि बढ़ा दी गई, जिससे इसके बुनियादी ढांचे और शासन परियोजनाएं जीवित रहीं।
यानि अगर इन दोनों पैकेज, USAID और MCC को जोड़ दिया जाए तो कुल 900 मिलियन डॉलर से ज्यादा की मदद हो जाती है। अगर इस फंड को और ज्यादा तोड़कर देखें तो पता चलता है कि इस रकम में 37 मिलियन डॉलर नागरिक समाज और मीडिया के लिए, 35 मिलियन डॉलर किशोर प्रजनन स्वास्थ्य परियोजना के लिए, और 8 मिलियन डॉलर "डेमोक्रेटिक प्रोसेसेस" के लिए आवंटित किए गए हैं। यहां तक कि 5 लाख डॉलर का छोटा प्रोजेक्ट "डेमोक्रेसी रिसोर्स सेंटर नेपाल" भी पूरी तरह खर्च हो चुका है। आलोचकों का मानना है कि स्वास्थ्य और शोध जैसे दिखने वाले ये कार्यक्रम असल में राजनीतिक पहुंच और नैरेटिव बनाने के औजार होते हैं।
एनजीओ के जरिए नेपाल में हिंसा की आग
द संडे गार्जियन की रिपोर्ट से पता चलता है कि NDI, IRI और IFES ने जिस तरह की गतिविधियां चलाई हैं, वो काफी संदिग्ध हैं। NDI ने 2020-22 के बीच संघीय ढांचे, दलित अधिकार, जलवायु परिवर्तन और युवाओं की भूमिका पर रिपोर्ट्स निकालीं और युवाओं के लिए ट्रेनिंग टूलकिट तैयार की। IRI ने राष्ट्रीय सर्वे के जरिए जनता के मूड को मापा और दिखाया कि युवाओं में नई पार्टियों की चाहत और बेरोजगारी को लेकर असंतोष कितना गहरा है। IFES ने 2022 के स्थानीय चुनावों में तकनीकी सहयोग और मतदाता जागरूकता अभियान चलाए।
आधिकारिक रूप से इन कार्यक्रमों का लक्ष्य नेपाल में लोकतंत्र को और मजबूत करना था, युवाओं की लोकतंत्र में भागीदारी को और बढ़ाना और विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित करना था, लेकिन आलोचक का कहना है इन्हें नेपाल के दलों और नागरिक समाज में अमेरिकी एजेंडा डालने का तरीका मानते हैं। यही वजह है कि आज काठमांडू की सड़कों पर जो युवा आंदोलनकारी हैं, वही कुछ साल पहले अमेरिकी फंडिंग से चलने वाले ट्रेनिंग और एक्टिविज्म प्रोग्राम्स का हिस्सा रहे।

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