रायपुर के इतिहास में पहली बार लाभांडी दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास का आयोजन

रायपुर। राजधानी रायपुर के इतिहास में यह पहला अवसर है जब लाभांडी के 1008 पद्मप्रभ दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास का आयोजन किया जा रहा है। पावन वर्षायोग 2025 का शुभारंभ आर्यिका अंतर्मति माताजी की ससंघ के पावन सानिध्य में कलश स्थापना और ध्वजारोहण के साथ हुआ। कलश स्थापना समारोह में अरुण भैया, संजीव भैया कटंगी, सुनील भैया रायपुर, अंकित भैया भिलाई के साथ प्रतिभास्थली से पधारी दीदियां विशेष रूप से उपस्थित थी । प्रमुख कलश की स्थापना का सौभाग्य समाज श्रेष्ठी हनुमान प्रसाद, राजकुमार, विनोद कुमार, दिलीप कुमार जैन बड़जात्या परिवार को प्राप्त हुआ ।

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के भामाशाह विनोद बडजात्या परिवार द्वारा 3000 स्क्वायर फीट भूमि लभांडी मंदिर के लिए दान की घोषणा की गई । साथ ही पदम चंद जितेंद्र गदिया, रतनलाल संजय बढ़जात्या, सज्जन बड़जात्या, गुलाबचंद मनसुख पाटौदी रांची, केशरी चंद मनीष जैन बिलासपुर, श्रीसनत जैन चूड़ी वाले, संजय जैन साइंटिस्ट, संजय जैन सतना, रवि सेठी सहित समाज जनों ने मंगल कलश स्थापना का सौभाग्य प्राप्त किया।

समारोह का संचालन चंद्रकांत जैन राजनंदगांव द्वारा किया गया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों सहित रायपुर जैन समाज ने बड़े ही उत्साह पूर्वक भाग लिया । आराधना के क्रम में रविवार सुबह 6 बजे अभिषेक शांतिधारा, 6.30 बजे पूजन, 7 बजे ध्वजारोहण और मंडप उद्घाटन, 7.30 बजे मंगलाचरण, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं आचार्य विद्यासागर स्मारक अनावरण के साथ आचार्य जी की दीक्षा दिवस पर आयोजित पूजनकर्ता को पुरस्कार वितरण हुआ। इसके पश्चात 8.30 बजे शास्त्र भेंट, महिला मंडल द्वारा मंगलाचरण, सकल दिगम्बर जैन समाज द्वारा चातुर्मास निवेदन, 9 बजे आचार्य भगवन की पूजन, 9.30 बजे कलश स्थापना और 10 बजे आर्यिका संघ का प्रवचन हुआ। पावन वर्षायोग 2025 समिति ने ससंघ से चातुर्मास का निवेदन किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। 

आध्यात्म और आत्मा से जुड़ने का समय है चातुर्मासः आर्यिका अंतर्मति माताजी

लाभांडी स्थित 1008 पद्मप्रभ दिगम्बर जैन मंदिर में पावन वर्षावास 2025 के कलश स्थापना के दिन रविवार को आर्यिका अंतर्मति माताजी ने कहा कि वर्षा ऋतु के आगमन के साथ चातुर्मास की शुरुआत हो जाती है। यह चार महीने का विशेष काल जैन धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। यह केवल मौसम के परिवर्तन का समय नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर झांकने और उसे संवारने का अवसर है।

चातुर्मास त्याग, संयम और धर्म की साधना का काल है। इस दौरान आमतौर पर विवाह, यात्राएं, उत्सव और सामाजिक गतिविधियां स्थगित कर दी जाती हैं। मान्यता है कि जब बाहरी दुनिया की चहल-पहल शांत हो जाती है, तभी व्यक्ति अपने भीतर के संसार से जुड़ सकता है। विशेष बात यह है कि चातुर्मास की जिनवाणी केवल श्रवण तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह वाणी हमारे जीवन का आधार है। केवल सुनने से जीवन नहीं बदलता, जब तक हम उसे अपने आचरण में न उतारें। अगर जिनवाणी को जीवन में लागू नहीं कर पाए, तो जीवन की गाड़ी कभी संतुलन में नहीं आ पाएगी। परमात्मा की वाणी को केवल बाहर से सुनने का कोई लाभ नहीं, जब तक वह हमारे व्यवहार और सोच में प्रकट न हो।

जितना हम उस वाणी को आत्मसात करेंगे, उतना ही जीवन में स्थिरता और सच्चा आनंद मिलेगा। चातुर्मास का अर्थ है कि धर्म की लाइन ऑन और सांसारिक जीवन की गतिविधियों पर विराम। इन चार महीनों में आत्मिक साधना को प्राथमिकता दी जाती है। यह समय होता है अपने करीब आने का, स्वयं से जुड़ने का। जितना व्यक्ति अपने भीतर उतरता है, उतना ही वह परमात्मा के निकट पहुंचता है। चातुर्मास हमें याद दिलाता है कि असली सुंदरता शरीर में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धता में छिपी होती है। इसलिए यह काल केवल पर्व नहीं, आत्मविकास की यात्रा है।

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