छतों पर मच्छरों का लार्वा मिला तो कटेगा चालान:मानसून में बढ़ता है डेंगू-मलेरिया का खतरा

मानसून की एंट्री होने वाली है। इस सीजन में जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE), डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे मच्छर जनित रोगों का खतरा ज्यादा रहता है। इन पर लगाम कसने के लिए मध्यप्रदेश का स्वास्थ्य विभाग अब हाई-टेक मोड पर आ गया है।

विभाग इंदौर में सफल ट्रायल के बाद भोपाल और ग्वालियर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जीपीएस आधारित इंटीग्रेटेड ड्रोन सर्विस की शुरुआत करने जा रहा है। इसका उद्देश्य मच्छरों के लार्वा को पनपने से रोकना है।

इसके जरिए शहर की ऊंची इमारतों की छतों, खाली प्लॉटों और अन्य ऐसी जगहों पर जहां बारिश का पानी जमा रहता है, उनकी मॉनिटरिंग की जाएगी। विभाग का मानना है कि इसकी मदद से उन जगहों पर भी मच्छरों की ब्रीडिंग रोकी जा सकेगी, जहां कर्मचारी नहीं पहुंच पाते। वहीं, जिस भवन की छत पर लार्वा मिलेंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

यदि, यह प्रोजेकट सफल रहा तो इसके आखिरी चरण में साथ-साथ ड्रोन से ही दवा का छिड़काव भी किया जाएगा। दरअसल, राजधानी के जिला मलेरिया विभाग में करीब आधे पद खाली हैं। यही स्थिति प्रदेश के अन्य जिलों की है। ऐसे में कर्मचारी सभी जगह नहीं जा पाते। शहर का एक बड़ा हिस्सा छूट जाता था। जिससे डेंगू के रोकथाम के प्रयास लगातार असफल हो रहे थे।

इंदौर का सफल पायलट प्रोजेक्ट इंदौर में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर ड्रोन का उपयोग किया था, जिसके सफलता परिणाम आए। पहले इंदौर के 10 हाई-रिस्क क्षेत्रों का ड्रोन से सर्वे किया गया था। इन इलाकों में चार सालों के डेंगू के आंकड़ों का आकलन कर यह प्रोजेक्ट शुरू किया गया।

जिन इलाकों में ड्रोन से मैपिंग और छिड़काव किया गया, वहां डेंगू के मामलों में 60% तक की कमी दर्ज की गई। इंदौर में पिछली बार डेंगू के 550 मरीज मिले थे, जबकि इससे पहले यह संख्या 700 से ज्यादा थी।

लक्ष्य 2030 तक मलेरिया मुक्त प्रदेश

स्वास्थ्य विभाग के उप संचालक डॉ. हिमांशु जायसवाल ने बताया कि इंदौर में मिले पॉजिटिव रिजल्ट को देखते हुए इस प्रोजेक्ट को भोपाल और ग्वालियर में लॉन्च किया जा रहा है। पहले सर्वे किया जाएगा। इसके बाद दवा का छिड़काव किया जाएगा। इस बार फोकस पहले से चिह्नित हॉटस्पॉट पर रहेगा। इस बार ऑर्गेनिक दवाओं पर जोर दिया गया।

अब तक 40 फीसदी ऑर्गेनिक और 60 फीसदी केमिकल दवाओं का छिड़काव किया जाता था। इस साल से 75 फीसदी ऑर्गेनिक और 25 फीसदी केमिकल दवाओं का छिड़काव करेंगे। इससे इन मच्छरों को मारने वाली दवाओं से होने वाले दुष्प्रभावों को भी कम किया जा सकेगा।

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