दीवार गिरने से खराब हुए पैर,अब करते हैं फूड डिलेवरी:आईआईटी चेन्नई से तैयार कराई ई-ट्राइसाइकिल, गिग वर्कर के संघर्ष की कहानी

भोपाल की सड़कों पर एक ई-ट्राइसाइकिल दौड़ती नजर आती है। पीछे जोमेटो का फूड बॉक्स रखा होता है। ऑनलाइन खाना मंगाने वाले जब देखते हैं कि फूड डिलेवरी बॉय एक ट्राइसाइकिल से आया है तो लोगों के भीतर सम्मान का भाव दिखता है।

राजधानी में बैटरी वाली ट्राइसाइकिल से फूड डिलेवरी करने वाले कपिल बचपन से दिव्यांग नहीं, न ही किसी बीमारी के कारण वे दिव्यांगता के शिकार हुए। बल्कि दो साल पहले हुए हादसे के बाद उनकी जिन्दगी बदल गई।

मेरा नाम कपिल कुशवाह है। मैं हरदा जिले का रहने वाला हूं। 2023 में दीवार गिरने से मेरे कमर के नीचे का हिस्सा पैरालाइज्ड हो चुका है। स्पाइन कॉर्ड इंजुरी हुई थी मेरा एम्स में सर्जरी हुई और मेरी रीढ़ की हड्‌डी में रॉड डली हुई है। मुझे काम की बहुत जरूरत थी।

मैंने अपने यहां के विधायक जी से भी बात कर मदद मांगी। लेकिन, कोई रिस्पांस नहीं मिला। मैं जिला अस्पताल के डॉक्टर के पास गया। मेरा जो दिव्यांग सर्टिफिकेट बनना चाहिए डॉक्टर वो नहीं बना पा रहे। वो कहते हैं कि इंदौर या भोपाल में बनेगा। जबकि, हमारा जिला हरदा है वहां के डॉक्टर मेरा सही दिव्यांग सर्टिफिकेट नहीं बना पा रहे।

सरकार से मदद नहीं मिली, आईआईटी से तैयार कराई ई-ट्राइसाइकिल कपिल ने आगे कहा- सरकार से मुझे मदद नहीं मिली तो मैंने अपनी जेब से एक लाख दस हजार की न्यू मोशन बोल्ट ई- ट्राइसाइकिल खरीदी। चेन्नई आईआईटी मद्रास से उन्होंने मेरे नाम से बनाकर यह ट्राइसाइकिल भेजी है। उसी के माध्यम से मैं जोमेटो में फूड डिलेवरी का काम कर रहा हूं आगे संघर्ष करते हुए जीवन को काट रहा हूं।

ऑटोमोबाइल क्वालिटी चेकर था, एक घटना से जीवन संघर्ष में बदला मेरे परिवार में मेरी मां और मैं हूं। मेरी दो बहने हैं उनकी शादी हो चुकी है। मेरी शादी नहीं हुई है। इस घटना के पहले मैं इंदौर में आयशर मोटर्स में क्वालिटी चेकर की पोस्ट पर काम करता था। जोमेटो में अभी रोज तीन-चार सौ रुपए हो पाता है। क्योंकि, हमारी गाड़ी की बैटरी की रेंज कम है। इसलिए हम ज्यादा देर तक काम नहीं कर पाते।

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