मतांतरण के बाद नहीं मिल सकता आदिवासी होने का लाभ, MP हाई कोर्ट भी दे चुका है निर्णय

भोपाल। सुप्रीम कोर्ट के पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट अनुसूचित जाति-जनजाति के मतांतरण को लेकर कुछ साल पूर्व फैसला सुना चुका है। नरसिंहपुर जिले के एक युवक सुशांत पुरोहित के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज प्रकरण पर रोक लगाते हुए जबलपुर हाईकोर्ट ने अपने इस अहम आदेश में कहा था कि मतांतरण कर हिंदू से मुस्लिम बनने के बाद आदिवासी होने का नहीं लाभ दिया जा सकता।
किम्मल बाई उर्फ मुमताज बी ने एससी-एसटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज कराया था। इसके विरुद्ध याचिकाकर्ता सुशांत पुरोहित की ओर से हाई कोर्ट में कहा गया था कि मतांतरण करके हुसैन कादरी से विवाह किया था और नाम परिवर्तित करके मुमताज बी कर लिया। इस आधार पर वह अपने आदिवासी होने का अधिकार खो चुकी है।
मंत्री ने भी कहा था, डीलिस्टिंग जल्द से जल्द लागू होना चाहिए
हाई कोर्ट ने इस तर्क को सही माना और एट्रोसिटी एक्ट के प्रकरण पर रोक लगा दी थी। उधर, 30 जनवरी 2025 को इंदौर में मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने आदिवासी समाज में हो रहे मतांतरण को लेकर कहा था कि डीलिस्टिंग जल्द से जल्द लागू होना चाहिए। एक व्यक्ति आदिवासी समाज छोड़कर दूसरे समाज में चला जाता है। उसे जो लाभ मिलता है, उसे तत्काल खत्म कर देना चाहिए।
मतांतरण पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या सुनाया फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एससी-एसटी एक्ट (Supreme Court on SC/ST Act)से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जा सकता।
धर्म परिवर्तन पर खत्म होगा एससी दर्जा
जस्टिस पी. के. मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने के साथ ही अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि यह नियम बिना किसी अपवाद के लागू होता है।





