रेलवे में 20 साल पुरानी परंपरा खत्म, अब रिटायरमेंट पर नहीं मिलेगा चांदी का सिक्का

भोपाल। मंडल कार्यालय में शुक्रवार को आयोजित विदाई समारोह भावनात्मक माहौल में संपन्न हुआ। जनवरी माह में सेवानिवृत्त हुए 32 रेल कर्मचारियों को मंच से सम्मानित किया गया।

समारोह में तालियों की गूंज, सम्मान पत्र और अंतिम भुगतान से जुड़ी सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं, लेकिन 20 वर्षों से चली आ रही एक परंपरा के अभाव ने कर्मचारियों को मायूस कर दिया।रेलवे बोर्ड द्वारा सेवानिवृत्त कर्मचारियों को दिए जाने वाले स्वर्ण-मढ़ित चांदी के सिक्के की परंपरा समाप्त कर दी गई है। इस फैसले से कई कर्मचारियों के चेहरे पर निराशा साफ नजर आई। उनका कहना था कि यह सिक्का केवल सम्मान नहीं, बल्कि वर्षों की सेवा की एक यादगार निशानी हुआ करता था।

इस अवसर पर मंडल रेल प्रबंधक पंकज त्यागी ने सभी सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सम्मानित करते हुए उनके योगदान की सराहना की।

24 घंटे की जिम्मेदारी, कोई तय समय नहीं

चीफ ट्रैक्शन लोको पायलट एके जैन ने बताया कि उन्होंने 1988 में रेलवे सेवा ज्वाइन की थी। इलेक्ट्रिक लोको संचालन, समय प्रबंधन और लगातार ट्रेन मूवमेंट पर नजर रखना बड़ी जिम्मेदारी होती है। काम का कोई तय समय नहीं रहता। उनका मानना है कि चांदी महंगी होने और नकली सिक्कों की शिकायतों के चलते यह परंपरा बंद की गई होगी।

सेवा की यादगार थी चांदी

सब इंस्पेक्टर प्रभुनाथ तिवारी ने कहा कि उन्होंने 1987 में सेवा शुरू की थी और डीआरएम कार्यालय के कंट्रोल रूम में कार्यरत रहे। यात्रियों की सुरक्षा और समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने कहा कि चांदी का सिक्का सेवा जीवन की स्मृति था, उसका बंद होना दुखद है।

परिवार जैसा रहा कार्यकाल

कमर्शियल विभाग में सफाई कर्मचारी के रूप में कार्यरत रहीं राम कलेई ने बताया कि 10 वर्षों की सेवा में कभी कोई बड़ी परेशानी नहीं आई। उन्होंने सवाल उठाया कि जब वर्षों से यह परंपरा चली आ रही थी, तो इसे अचानक बंद क्यों किया गया।

रोमांच और चुनौतियों से भरी नौकरी

मुख्य लोको निरीक्षक सुरेन्द्र प्रताप वर्मा ने बताया कि उन्होंने 1988 में सहायक लोको पायलट के रूप में करियर शुरू किया था। मौसम की मार, तकनीकी खराबी और अनियमित समय के बावजूद यह नौकरी हमेशा चुनौतीपूर्ण और रोमांचक रही। उन्होंने कहा कि 20 साल पुरानी परंपरा का खत्म होना कर्मचारियों के लिए पीड़ादायक है।

2006 में शुरू हुई थी परंपरा

रेलवे बोर्ड ने मार्च 2006 में सेवानिवृत्त कर्मचारियों को लगभग 20 ग्राम वजन का गोल्ड प्लेटेड सिल्वर मेडल देने की शुरुआत की थी। भोपाल मंडल में सामने आए मेडल घोटाले और कुछ कर्मचारियों को नकली चांदी के सिक्के मिलने की शिकायतों के बाद रेलवे बोर्ड ने यह परंपरा पूरी तरह समाप्त कर दी है।

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