भोपाल-देवास, लेबड़-जावरा समेत 3 टोल रोड का मामला:3 टोल रोड पर लागत से 6 गुना तक वसूली

भोपाल, मध्य प्रदेश के भोपाल-देवास, लेबड़-जावरा और जावरा-नयागांव टोल रोड पर लागत से कई गुना अधिक टोल वसूली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर हाई कोर्ट को तीन महीने में सुनवाई पूरी कर निर्णय देने के निर्देश दिए हैं।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की खंडपीठ ने पूर्व विधायक पारस सकलेचा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला नोएडा ब्रिज टोल वसूली निरस्त करने के 20 दिसंबर 2024 के फैसले के समान प्रकृति का है, इसलिए हाई कोर्ट इस पर जल्द सुनवाई करे।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 15 दिन के भीतर हाई कोर्ट में नया आवेदन दाखिल करने की अनुमति दी है। साथ ही टोल रोड के निवेशकों और अन्य प्रभावित पक्षों को भी मामले में पक्षकार बनाने के निर्देश दिए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि इन टोल सड़कों पर परियोजना लागत से कई गुना अधिक राशि वसूली जा चुकी है।

आरोप- रखरखाव खर्च और ब्याज को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया

  • याचिका में आरोप लगाया गया है कि टोल संचालित करने वाली कंपनी ने रखरखाव खर्च और ब्याज को वास्तविक खर्च से अधिक दिखाकर टोल वसूली जारी रखी। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने पक्ष रखा।
  • राज्य सरकार की ओर से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह पैरवी करेंगे। याचिका में यह भी कहा गया है कि इन टोल सड़कों पर दुर्घटनाओं के आंकड़े चिंताजनक हैं, इसके बावजूद टोल वसूली जारी रखी गई है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि नोएडा ब्रिज टोल मामले की तरह यहां भी टोल वसूली निरस्त की जाए।
  • इससे पहले लेबड़-जावरा और जावरा-नयागांव टोल रोड को लेकर अप्रैल 2022 में इंदौर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2022 में इसे खारिज कर दिया था।
  • इसके बाद दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई करने के निर्देश दिए हैं।

नोएडा ब्रिज फैसले का जिक्र इसलिए

 नोएडा ब्रिज पर 2001 से टोल वसूली के खिलाफ दायर याचिका में कैग जांच में कंपनी द्वारा परियोजना लागत व खर्च बढ़ाकर दिखाने का खुलासा हुआ। इस आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2016 में टोल वसूली निरस्त कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने 20 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा।

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