शम्मी कपूर ने खुद से बड़ी गीता बाली की मांग सिंदूर की जगह लिपस्टिक से क्यों भरी, जॉनी वॉकर ने की थी गड़बड़

बॉलीवुड में कुछ एक्टर अपनी जिंदादिली की वजह से आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं। शम्मी कपूर वैसे ही सितारों में से एक हैं। शम्मी की ‘याहू’ की गूंज ने आज भी भारतीय सिनेमा में उन्हें जिंदा रखा है। उनका डांस, उनकी स्टाइल और उनका बेबाकपन उस दौर के बाकी सितारों से काफी अलग था। आज ही के दिन साल 2011 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। आज यहां हम लेकर आए हैं उनकी गुपचुप हुई शादी का किस्सा, जहां उन्होंने अपनी पत्नी का मांग सिंदूर की जगह लिपस्टिक से भरा था।

शम्मी कपूर को पॉप्युलैरिटी मिली साल 1957 में रिलीज हुई फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ से। हालांकि इस फिल्म के लिए पहले देव आनंद को चुना गया था लेकिन उन्होंने नई एक्ट्रेस अमीता के साथ काम करने से इनकार कर दिया और तब निर्देशक नासिर हुसैन के सामने शम्मी कपूर आ खड़े हुए। हालांकि उस वक्त नासिर हुसैन को उन पर कुछ खास भरोसा नहीं था, पर एक शाम डिनर टेबल पर जब बातचीत हुई तो सब कुछ बदल गया और यही डिनर करियर का अहम मोड़ बनकर आया।

जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर काम करते थे और मासिक तनख्वाह महज 50 रुपए

शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई में हुआ था। उनका असली नाम शमशेर राज कपूर था। पिता पृथ्वीराज कपूर पहले से थिएटर और फिल्मों की दुनिया में नाम बना चुके थे और भाई राज कपूर उस दौर में इंडस्ट्री का उभरता चेहरा थे। शम्मी कपूर की शुरुआती पढ़ाई कोलकाता में हुई, जहां पृथ्वीराज कपूर थिएटर किया करते थे। जब परिवार मुंबई लौटा, तो शम्मी भी पृथ्वी थिएटर से जुड़ गए। यहीं से उन्होंने अभिनय की शुरुआत की। यहां वह जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर काम करते थे और उन्हें मासिक तनख्वाह महज 50 रुपए मिलती थी।

शम्मी उन्हें डिनर पर लेकर गए और वहीं बात बन गई

बचपन में ही उन्होंने क्लासिकल म्यूजिक सीखा, लेकिन उनकी रुचि वेस्टर्न म्यूजिक की तरफ थी, जिसका असर बाद में उनके डांसिंग स्टाइल में भी खूब देखने को मिला। उनका फिल्मी करियर 1953 में ‘जीवन ज्योति’ से शुरू हुआ, लेकिन लगातार 18 फिल्मों की असफलता ने उन्हें निराश कर दिया था। लेकिन फिर आई 1957 में ‘तुमसा नहीं देखा’ फिल्म। शम्मी कपूर की बायोग्राफी ‘शम्मी कपूर: द गेम चेंजर’ लिखने वाले पत्रकार रऊफ अहमद के मुताबिक, इस फिल्म के लिए पहले देव आनंद को साइन किया गया था, लेकिन उन्होंने अमीता के साथ काम करने से इनकार कर दिया। निर्देशक नासिर हुसैन शम्मी कपूर को लीड रोल में लेना नहीं चाहते थे। लेकिन शम्मी उन्हें डिनर पर लेकर गए और वहीं पर हुई बातचीत ने निर्देशक की सोच बदल दी।

फिल्म बनी, रिलीज हुई और शम्मी कपूर की किस्मत पलट गई

1959 की ‘दिल देके देखो’ और फिर 1961 की ‘जंगली’ के साथ शम्मी कपूर का स्टारडम ऊंचाइयों पर पहुंच गया। ‘जंगली’ फिल्म का गाना ‘याहू!’ आज भी भारतीय सिनेमा का सबसे यादगार गाना है, और ‘याहू’ लोग जोश के साथ बोलते हैं। इसके बाद ‘प्रोफेसर’ (1962), ‘कश्मीर की कली’ (1964), ‘जानवर’ (1965), ‘तीसरी मंजिल’ (1966), और ‘ब्रह्मचारी’ (1968) जैसी फिल्मों ने शम्मी कपूर को 60 के दशक का स्टाइलिश और एनर्जेटिक हीरो बना दिया।

शानदार एक्टिंग के लिए बेस्ट एक्टर अवॉर्ड

‘ब्रह्मचारी’ (1968) में शानदार एक्टिंग के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिला। मगर जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, चोटों और स्वास्थ्य समस्याओं ने उन्हें धीमा कर दिया। फिल्म ‘राजकुमार’ की शूटिंग में हाथी की टक्कर से पैर टूट गया, जिसके चलते उन्हें लंबे समय तक आराम करना पड़ा। 1970 के दशक में शम्मी ने सपोर्टिंग रोल निभाना शुरू कर दिया। ‘विधाता’ (1982) में उनके रोल को खूब सराहा गया और इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवॉर्ड मिला।

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