2600 साल से पुराना इतिहास, सिंगापुर तक धमक, यूपी के काला नमक चावल का महात्‍मा बुद्ध से कनेक्‍शन समझिए

सिद्धार्थनगर: यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को सिद्धार्थनगर में 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा की परियोजनाओं का शुभारंभ किया। भगवान बुद्ध की आध्यात्मिक धरती सिद्धार्थनगर केवल अपने धार्मिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि काला नमक चावल के कारण देश और दुनिया में जाना जाने लगा है।

सदियों से चली आ रही यह पारंपरिक खेती अब उत्तर प्रदेश सरकार की ‘एक जनपद-एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना के माध्यम से विकास की नई कहानी लिख रही है। काला नमक चावल स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने और जिले की अर्थव्यवस्था को सशक्त करने का भी माध्यम बन रहा है।

600 ईसा पूर्व से पिपरहवा में उगाया जा रहा विशिष्ट धान

काला नमक चावल का इतिहास लगभग 2600 साल से भी अधिक पुराना है। इसका उत्पादन 600 ईसा पूर्व से सिद्धार्थनगर के पिपरहवा क्षेत्र में होता आ रहा है। यह वही इलाका है, जो भगवान बुद्ध के जीवन और उनके संदेशों से गहराई से जुड़ा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ज्ञान प्राप्ति के बाद जब महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु लौटे, तब उन्होंने इस क्षेत्र के ग्रामीणों को आशीर्वाद स्वरूप काली भूसी वाले धान के दाने दिए थे। कहा जाता है कि बुद्ध ने इसकी विशिष्ट सुगंध को अपनी स्मृति से जोड़ते हुए कहा था कि यह महक सदैव उनकी याद दिलाती रहेगी। तभी से यह चावल धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन गया।

सदियों से चली आ रही यह पारंपरिक खेती अब उत्तर प्रदेश सरकार की ‘एक जनपद-एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना के माध्यम से विकास की नई कहानी लिख रही है। काला नमक चावल स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने और जिले की अर्थव्यवस्था को सशक्त करने का भी माध्यम बन रहा है।

600 ईसा पूर्व से पिपरहवा में उगाया जा रहा विशिष्ट धान

काला नमक चावल का इतिहास लगभग 2600 साल से भी अधिक पुराना है। इसका उत्पादन 600 ईसा पूर्व से सिद्धार्थनगर के पिपरहवा क्षेत्र में होता आ रहा है। यह वही इलाका है, जो भगवान बुद्ध के जीवन और उनके संदेशों से गहराई से जुड़ा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ज्ञान प्राप्ति के बाद जब महात्मा बुद्ध कपिलवस्तु लौटे, तब उन्होंने इस क्षेत्र के ग्रामीणों को आशीर्वाद स्वरूप काली भूसी वाले धान के दाने दिए थे। कहा जाता है कि बुद्ध ने इसकी विशिष्ट सुगंध को अपनी स्मृति से जोड़ते हुए कहा था कि यह महक सदैव उनकी याद दिलाती रहेगी। तभी से यह चावल धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन गया।

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