ज्योतिरादित्य तो भाजपा में आ गए, लेकिन ग्वालियर चंबल में साथ नहीं ला पाए दलित मतदाता

भोपाल। लोकसभा चुनाव परिणामों की समीक्षा में यह बात सामने आई है कि विधानसभा चुनाव की तरह ही लोकसभा चुनाव में भी ग्वालियर-चंबल संभाग में दलित वोट भाजपा को नहीं मिले। संगठन इस बात से हैरान है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कांग्रेस के कई दलित नेताओं के भाजपा में आने के बाद भी ग्वालियर-चंबल में यह वर्ग भाजपा के साथ क्यों नहीं आ रहा है।
तीनों ही भाजपा की पारंपरिक सीटें
पार्टी को इस लोकसभा चुनाव में तीनों संसदीय सीटों ग्वालियर, मुरैना और भिंड को जीतने के लिए काफी पसीना बहाना पड़ा। तीनों ही भाजपा की पारंपरिक सीटें हैं, लेकिन वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद से यहां दलित वर्ग के भाजपा से दूरी बना लेने से पार्टी को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
बड़ी संख्या में दलित समुदाय
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में दलित समुदाय के मतदाता हैं। पिछले कुछ वर्षों से यहां बहुजन समाज पार्टी की पकड़ कमजोर होने के बाद से यह वर्ग कांग्रेस के साथ चला गया है। मध्य प्रदेश की राजनीति भले ही द्विध्रुवीय हो, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश के कई अंचलों में दलित वर्ग पर कब्जा कर रखा है।
सर्वाधिक प्रभाव वाला क्षेत्र ग्वालियर-चंबल है, यहां का दलित वर्ग लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी के साथ रहा है। वर्ष 2018 में एट्रोसिटी एक्ट में हुए संशोधन के खिलाफ जब भारत बंद किया गया था, तब ग्वालियर- चंबल में इस आंदोलन में 8 लोग मारे गए थे और हजारों दलितों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गए थे।
यही वह टर्निंग पाइंट था, जहां से दलित वर्ग बसपा का दामन छोड़ बड़ी संख्या में कांग्रेस में सम्मिलित हो गया था। ग्वालियर- चंबल में तब ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथों में कांग्रेस की कमान हुआ करती थी। इसी समर्थन से कांग्रेस ने 2018 में कमल नाथ के नेतृत्व में सरकार भी बना ली थी।
बाद में सिंधिया तो भाजपा में आ गए लेकिन दलित मतदाता को वे भाजपा में लाने में सफल नहीं हो पाए। यही वजह है कि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव और वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ग्वालियर-चंबल के दलित वर्ग का भाजपा को समर्थन नहीं मिल पाया।
पार्टी ने दलित वर्ग को भाजपा से जोड़ने के उद्देश्य से ही लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति मोर्चा का अध्यक्ष बनाया था। पार्टी का यह प्रयास भी असफल हो गया। हाल में हुए लोकसभा चुनाव में भी दलित वर्ग के वोट में कमी आई है। अब चुनावी समीक्षा में दलित वर्ग में कमजोर पैठ ने पार्टी को फिर चिंता में डाल दिया है।





