ईरान-इजराइल जंग के बीच NATO की समिट आज से:अमेरिका के दम पर सबसे ताकतवर मिलिट्री संगठन बना

नीदरलैंड के द हेग शहर में आज से नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (NATO) समिट शुरू हो रहा है। 76 साल पहले बना NATO अमेरिका के दम पर दुनिया का सबसे मजबूत सैन्य संगठन है, लेकिन आज यह अपने सबसे बुरे दौर में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार NATO को लेकर नाखुशी जाहिर कर चुके हैं।

इस बार की बैठक को NATO के इतिहास की सबसे अहम बैठकों में माना जा रहा है क्योंकि यह ऐसे समय हो रही है जब रूस-यूक्रेन में युद्ध जारी है, मिडिल ईस्ट में ईरान-इजराइल जंग शुरू हो चुकी है और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था अस्थिर है।

सोवियत संघ पर चुनाव में धांधली के आरोप, फिर बनी NATO

सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद USSR यानी सोवियत संघ (आज के रूस) ने पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, हंगरी और चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्ट सरकार बनाने में मदद की। उस पर चुनाव में हेराफेरी करने के आरोप भी लगे।

सोवियत संघ की योजना तुर्किये और ग्रीस पर दबदबा बनाने की भी थी। इन दोनों देशों पर कंट्रोल से सोवियत संघ ब्लैक सी के जरिए होने वाले दुनिया के व्यापार को कंट्रोल करना चाहता था। USSR के इन कदमों को पश्चिमी देशों ने आक्रमण की तरह माना। इन देशों को डर था कि पूरे यूरोप में कम्युनिज्म फैल जाएगा।

इससे निपटने के लिए अमेरिका ने 1947 में ट्रूमैन डॉक्ट्रिन (ट्रूमैन सिद्धांत) की घोषणा की। इसके तहत कम्युनिज्म का विरोध कर रहे देशों को समर्थन देने की बात कही। इसके साथ ही सेकंड वर्ल्ड वॉर में तबाह हो चुके यूरोपीय देशों की आर्थिक मदद और री-डेवलपमेंट के लिए अमेरिका ने मार्शल प्लान पेश किया। इसे आधिकारिक तौर पर यूरोपियन रिकवरी प्रोग्राम कहा गया।

USSR के खतरों का मुकाबला करने के लिए पश्चिमी यूरोप के देशों ने एक सुरक्षा समझौता किया। 1948 में ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग ने ब्रसेल्स संधि पर साइन किए। हालांकि इन देशों को सोवियत संघ का मुकाबला करने लिए अमेरिका की जरूरत थी। इसलिए उन्होंने एक बड़े सैन्य गठबंधन की मांग की।

4 अप्रैल 1949 को अमेरिका को मिलाकर 12 देशों ने नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी पर साइन किए और NATO का गठन किया। इस समझौते के आर्टिकल 5 के मुताबिक अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो सभी सदस्य देश उसकी रक्षा करेंगे।

NATO से अलग हुआ फ्रांस, 43 साल बाद फिर जुड़ा

1966 में फ्रांस ने NATO से खुद को आंशिक रूप से अलग कर लिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति शार्ल्स डी गॉल का मानना था कि अमेरिका और ब्रिटेन इस संगठन में जरूरत से ज्यादा प्रभाव रखते हैं और इससे फ्रांस की संप्रभुता प्रभावित हो रही है।

गॉल चाहते थे कि फ्रांस की सैन्य नीति पर विदेशी नियंत्रण न हो। नतीजतन, फ्रांस ने NATO की संयुक्त सैन्य कमान से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने देश में मौजूद NATO के मुख्यालय और अमेरिकी सैनिकों को हटा दिया। हालांकि फ्रांस संगठन का राजनीतिक सदस्य बना रहा और 2009 में राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के शासनकाल में फ्रांस फिर से NATO का सैन्य मेंबर बन गया।

तुर्किये से विवाद के बाद ग्रीस ने NATO छोड़ा

1974 में साइप्रस में एक तख्तापलट हुआ, जिसे ग्रीस का समर्थन था। इसका मकसद साइप्रस को ग्रीस के साथ मिलाना था। इससे नाराज होकर तुर्किये ने साइप्रस पर हमला कर दिया और उसके एक तिहाई इलाके पर कब्जा कर लिया।

ग्रीस और तुर्किये दोनों NATO के मेंबर थे। ग्रीस को लगा कि NATO ने तुर्किये को रोकने की कोशिश नहीं की। ग्रीस ने नाराज होकर NATO की सैन्य गतिविधियों से खुद को अलग कर लिया, हालांकि वह भी राजनीतिक सदस्य बना रहा। छह साल बाद 1980 में अमेरिका की मध्यस्थता से ग्रीस फिर से सैन्य रूप से NATO में शामिल हो गया।

NATO देशों के बीच और कई विवाद हुए

तुर्की और अमेरिका के संबंधों में भी गंभीर तनाव पैदा हुए हैं। विशेष रूप से सीरिया संघर्ष के दौरान अमेरिका ने कुर्द लड़ाकों को समर्थन दिया, जिन्हें तुर्किये आतंकवादी संगठन मानता है। इससे दोनों देशों के बीच गहरा विवाद हुआ।

इसके अलावा तुर्किये ने रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी खरीदा था। यह भी दोनों देशों के बीच बड़ा मुद्दा बन गया था। अमेरिका ने इसे NATO की सिक्योरिटी के लिए खतरा बताया और जवाब में तुर्की को F-35 फाइटर जेट कार्यक्रम से बाहर कर दिया।

पूर्वी यूरोप का देश हंगरी भी कई बार पश्चिमी देशों के लिए चिंता का विषय रहा है। प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन पर लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर करने के आरोप हैं। हंगरी की विदेश नीति अक्सर रूस के करीब दिखाई देती है। यूक्रेन से जुड़े कई प्रस्तावों को हंगरी ने वीटो भी किया है, जिससे NATO के फैसलों पर असर पड़ा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button