रूस की अजेय छवि धराशायी, लाखों लोगों की मौत, एक्सपर्ट से जानें चार साल बाद कहां पहुंची यूक्रेन की जंग

रूस-यूक्रेन संघर्ष को चार साल पूरे हो गए। मॉस्को जिसे स्पेशल मिलिट्री ऑपरेशन कहता है, वह 24 फरवरी 2022 को शुरू हुआ था। तब दुनिया कह रही थी कि यह संघर्ष दो हफ्ते से अधिक नहीं चलेगा। लेकिन, आज 1460 दिन बाद भी यह जारी है। इससे पता चल गया कि शुरुआती अनुमान पूरी तरह गलत थे। अभी यह भी नहीं लग रहा कि संघर्ष जल्द खत्म होने वाला है। इस संघर्ष ने दोनों देशों की कई गलतफहमियों को उजागर किया। अजेय मानी जाने वाली रूसी सेना के प्रति धारणा खत्म हो गई। संघर्ष ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल दिया। अमेरिका-यूरोप के बीच भी ट्रांस अटलांटिक संबंधों में तनाव दिखे। कुल मिलाकर, यह संघर्ष अब सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं रही, इसने दुनिया की राजनीति और सैन्य ताकत की हकीकत को नए तरीके से सामने ला दिया है।
बड़ी संख्या में हताहत
संघर्ष में हताहत होने वालों की संख्या काफी ज्यादा है। सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनैशनल स्टडीज (CSIS) और ब्रिटिश साप्ताहिक जर्नल द इकॉनमिस्ट का अनुमान है कि इस संघर्ष में करीब 18 लाख लोग हताहत हुए हैं। इनमें 12 लाख रूसी सैनिक हैं। CSIS ने बताया कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद किसी भी शक्तिशाली देश को इतनी सैन्य क्षति नहीं हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले चार बरसों में करीब 3.25 लाख रूसी सैनिकों की जान गई है। कुछ रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब 2 लाख यूक्रेनी सैनिकों ने भी जान गंवाई है। अगर ये आंकड़े सही हैं तो 1945 के बाद अमेरिका द्वारा लड़े गए सभी युद्धों में जान गंवाने वाले अमेरिकी सैनिकों से यह संख्या करीब तीन गुना अधिक है।
भरोसे की कमी
रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता में सबसे बड़ी बाधा भरोसे की कमी है। रूस ने कह दिया है कि दोनेत्स्क और लुहान्स्क वाला डोनबास क्षेत्र का बड़ा हिस्सा जब तक उसे नहीं मिलेगा, वह युद्ध नहीं रोकेगा। इसके अलावा, खेरसोन और जापोरिजिया को भी मॉस्को अपना क्षेत्र मानने की मांग कर रहा है। उसने इन इलाकों को अपने संविधान में शामिल कर लिया है। रूस की मंशा है कि क्राइमिया को अन्य देश भी रूसी क्षेत्र मानें। रूस चाहता है कि यूक्रेन अपनी सेना घटाए, किसी भी सैन्य गठबंधन से दूर रहे और उसके क्षेत्र में विदेशी सैनिक न हों। लेकिन, रूस के पिछले कदमों को देखते हुए यूक्रेन को उस पर भरोसा नहीं। इसलिए वह पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका से पक्की सुरक्षा गारंटी चाहता है।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को चिंता है कि अगर जल्दबाजी में शांति समझौता होता है या यूक्रेन को अपने इलाके छोड़ने पड़ते हैं तो इससे वैश्विक नियम कमजोर होंगे और भविष्य में और हमले बढ़ सकते हैं। बड़े देशों के बदलते रुख ने हालात और मुश्किल कर दिए हैं। हालिया महीनों में अमेरिकी समर्थन कमजोर होता दिख रहा है। कई यूरोपीय देश भी पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं दिख रहे। उन्हें लग रहा है कि अमेरिका की गारंटी स्पष्ट नहीं है और यूरोप को अपनी सुरक्षा खुद करनी पड़ सकती है।
कमजोर पड़ता यूक्रेन
कई इलाकों में संघर्ष जारी है। यूक्रेन के प्रतिरोध को कमजोर करने के लिए रूस लगातार नागरिक और सैन्य ठिकानों पर हमले बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, पश्चिमी देशों से मिल रही सैन्य मदद कम होने से यूक्रेन की रक्षा क्षमता पर असर पड़ा है। इससे उसकी बातचीत की स्थिति भी कमजोर हुई है और युद्ध लंबा खिंच रहा है।
समझौते की कोशिश
संघर्ष को खत्म करने के लिए रुक-रुक कर बातचीत रही है। अमेरिका की मध्यस्थता में अबू धाबी और जिनेवा में कई दौर की वार्ता हो चुकी है। इसी से शांति समझौते का रास्ता बनाने की कोशिश है। इस साल जनवरी में अबू धाबी में हुई बातचीत को अमेरिका और यूक्रेन के अधिकारी सकारात्मक बता रहे हैं। इसमें मुख्य राजनीतिक झगड़ों की बजाय तकनीकी मामलों में काम होने, जैसे सीजफायर निगरानी, कैदियों की अदला-बदली, सेना की दूरी बरकरार रखने वाली व्यवस्था और कुछ सैन्य समन्वय शामिल हैं।
बड़ी सफलता नहीं
इस महीने जिनेवा में हुई बातचीत हर दिन सिर्फ दो घंटे हुई और कोई बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन दोनों पक्ष बैठक के लिए तैयार रहे। संघर्ष अब भी हवाई और जमीनी हमलों के साथ जारी है। मगर, जमीन पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा। उम्मीद है कि संघर्ष इस साल खत्म हो सकता है।





