‘अफीम’ बेच रहे कोचिंग माफिया… टॉप इकनॉमिस्‍ट ने UPSC क्रेज पर उठाए सवाल, कहा-एलन मस्‍क बनो

नई दिल्‍ली: संजीव सान्याल जाने-माने अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं। उन्‍होंने भारत में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की संस्कृति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे टैलेंट का गलत इस्तेमाल बताया है। सान्याल के अनुसार, ‘कोचिंग क्लास माफिया’ इस कल्‍चर को बढ़ावा दे रहे हैं। उनका कहना है कि यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) परीक्षा में बैठने वाले 99.9% लोग असफल हो जाते हैं। यानी सफलता का रेट उद्यमियों की तुलना में भी कम है। उन्होंने इस परीक्षा को जीवन का मुख्य लक्ष्य मानने के तर्क पर भी सवाल उठाया। उनका मानना है कि कोचिंग उद्योग जानबूझकर युवाओं को ऐसे जोखिम भरे रास्ते पर धकेलता है जिसका पेऑफ यानी व्यावसायिक लाभ बेहद कम है। वह इसे ‘अफीम बेचने’ जैसा बताते हैं। यह लाखों युवाओं को एक ऐसे सपने में उलझाए रखता है जिसके पूरे होने की संभावना लगभग न के बराबर है। वहीं, इसमें कोचिंग संस्थान भारी मुनाफा कमाते हैं।

कैसे अर्थव्‍यवस्‍था को बड़ी चोट?

यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ह्यूमन र‍िसोर्स यानी मानव पूंजी के अपव्यय का गंभीर मामला है। ऐसे समय में जब भारत को इनोवेशन, आंत्रेप्रेन्‍योरशिप और अलग-अलग सेक्‍टरों में विशेषज्ञता की जरूरत है, तब सबसे सक्षम युवा कई सालों तक एक ऐसी परीक्षा की तैयारी में लगे रहते हैं जो उन्हें मुश्किल से ही कोई नतीजा देती है। सफल होने वाले भी अक्सर अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होते। यह ‘आकांक्षा की गरीबी’ को दर्शाता है। यानी युवाओं की ऊर्जा को सही व्यावसायिक दिशा नहीं मिल पाती।

एलन मस्‍क बनने की दी सलाह

सान्याल ने सीए (चार्टर्ड अकाउंटेंट) कुशल लोढ़ा के साथ एक पॉडकास्ट में कहा कि इतनी कम सफलता दर होने के बावजूद लोग इसे क्यों चुनते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि लोगों को एलन मस्क बनने की कोशिश करनी चाहिए। सान्याल ने साफ किया कि उन्हें सिविल सर्वेंट बनने की इच्छा रखने वाले लोगों से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन, वे उन युवाओं के खिलाफ हैं जो सालों तक इस चक्र में फंसे रहते हैं। उन्होंने इसे मानव संसाधन की बर्बादी बताया है। मार्च 2024 के अंत में सान्याल ने यूपीएससी के प्रति क्रेज को लेकर चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि बहुत सारे युवा अपनी ऊर्जा यूपीएससी की परीक्षा पास करने में बर्बाद कर रहे हैं।

‘जाल’ में फंस रहे प्रतिभाशाली छात्र

अपने ताजा पॉडकास्ट में सान्याल ने तर्क दिया कि औसत के बजाय प्रतिभाशाली छात्र इस ‘जाल’ में फंस रहे हैं। परिवार प्रतिभाशाली छात्रों को ही दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहने और तैयारी करने के लिए भेजते हैं। इस तरह हम अपने सिस्टम से सर्वश्रेष्ठ लोगों को निकालकर ऐसी जगह लगा रहे हैं जहां 99.9% असफलता की दर है। सान्याल ने कोचिंग उद्योग पर भी निशाना साधा जो इस स्थिति का फायदा उठाता है। उन्होंने कहा कि यह उद्योग एक ‘कोचिंग क्लास माफिया’ चला जा रहा है। वो लोगों को ‘अफीम’ बेच रहा है। ये माफिया ऐसा ‘प्रोडक्‍ट’ बेच रहे हैं जो 99.9% समय विफल होने वाला है। सान्याल ने कहा कि सफल होने वाले 0.1% लोग भी जीवन में हमेशा रोमांचक काम नहीं करते हैं।

उद्यमियों की सफलता दर 0.1% से कहीं ज्‍यादा

सान्याल ने कहा कि कुछ लोग भारत सरकार में कैबिनेट सचिव जैसे पदों पर पहुंचते हैं। लेकिन, उनमें से ज्यादातर सामान्य काम ही करते हैं। उन्होंने सवाल किया कि इतनी ऊर्जा अन्य प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों में क्यों नहीं लगाई जाती। सान्याल के अनुसार, लोग खिलाड़ी, लेखक, कवि, गायक या उद्यमी बन सकते हैं। उद्यमियों की सफलता दर 0.1% से कहीं ज्‍यादा है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या यही तर्क एमबीए प्रवेश परीक्षाओं जैसे CAT (कॉमन एडमिशन टेस्ट) पर भी लागू होता है, जहां कुछ 100 आईआईएम (भारतीय प्रबंधन संस्थान) सीटों के लिए लाखों लोग प्रतिस्पर्धा करते हैं। इस पर सान्याल ने जवाब दिया कि उनमें से कई लोग कुछ और कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि बहुत सारे लोग CAT की परीक्षा पांच, छह या सात साल तक नहीं देते हैं। सान्याल ने कहा कि उन्हें इस संस्कृति से समस्या है। वह अक्सर प्रतिभाशाली लोगों से मिलते हैं जो यूपीएससी की तैयारी कर रहे होते हैं। सान्याल के अनुसार, इस तरह की ‘आकांक्षा की गरीबी’ ठीक नहीं है।


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