डेडलाइन के दबाव में फंस गए यूरोपीय देश, अमेरिका से कर ली घाटे की डील, भारत को रहना होगा होशियार

नई दिल्ली: अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) एक नए व्यापार समझौते पर सहमत हो गए हैं। रविवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसकी जानकारी दी। यह समझौता स्कॉटलैंड में यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ हुई बातचीत के बाद हुआ। बीबीसी के अनुसार, समझौते में ईयू से अमेरिका में आयात होने वाले ज्यादातर सामानों पर 15% का टैरिफ लगेगा। यूरोपीय संघ अमेरिका से 750 अरब डॉलर की ऊर्जा भी खरीदेगा। वे अमेरिका में पहले से कर रहे निवेश से 600 अरब डॉलर ज्यादा निवेश करने के लिए भी सहमत हुए हैं। यह समझौता 1 अगस्त से यूरोपीय आयात पर 30% टैरिफ लगाने की अमेरिका की डेडलाइन से ठीक पहले हुआ है। ट्रंप ने इस महीने की शुरुआत में ईयू के अधिकारियों को लिखे एक पत्र में इसकी चेतावनी दी थी।
अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता सतही तौर पर भले बड़ी उपलब्धि दिखे। लेकिन, यूरोपीय संघ के लिए यह ‘डेडलाइन’ के दबाव में की गई घाटे की डील साबित हो सकती है। ट्रंप की ओर से 1 अगस्त की डेडलाइन से पहले 30% टैरिफ लगाने की धमकी ने यूरोपीय संघ को एक ऐसी स्थिति में धकेल दिया। इसके कारण उसे अपेक्षाकृत कम अनुकूल शर्तों पर भी समझौता करना पड़ा। भारत को इस बदलते वैश्विक व्यापार परिदृश्य में सतर्क रहने की जरूरत है।
कैसे घाटे में यूरोपीय संघ?
ईयू के लिए यह समझौता कई मायनों में घाटे का सौदा है। समझौते के तहत ईयू से अमेरिका को आयातित ज्यादातर वस्तुओं पर 15% का टैरिफ लगाया जाएगा। यह पहले ब्रिटिश वस्तुओं पर लागू 10% दर से काफी ज्यादा है। भले ही यह ट्रंप की 30% की धमकी से कम हो। लेकिन, यूरोपीय निर्यातकों के लिए यह अतिरिक्त लागत है। इससे अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम होगी। यह रेट अमेरिका-जापान व्यापार सौदे में सहमत दर के समान है। लेकिन, यूरोप की अर्थव्यवस्था के आकार और अमेरिका के साथ उसके व्यापार संबंधों को देखते हुए, यह बड़ा बोझ है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने खुद स्वीकार किया कि ऑटो सेक्टर के संबंध में ‘15% टैरिफ दर सबसे अच्छी थी जो हमें मिल सकती थी।’ यह इस बात का साफ संकेत है कि ईयू को अपनी इच्छा के खिलाफ भी ऊंचे टैरिफ दरों को स्वीकार करना पड़ा।
ट्रंप प्रशासन ने यूरोपीय दवाओं पर 200% टैरिफ की धमकी दी थी। इससे उद्योग बुरी तरह प्रभावित होता। हालांकि, समझौते में यह साफ नहीं है कि इस पर क्या सहमति बनी। लेकिन, ट्रंप का यह बयान कि फार्मास्यूटिकल्स बहुत खास थे और अमेरिका में बनाने की जरूरत है, यह दर्शाता है कि यूरोप को इस क्षेत्र में भी कुछ रियायतें देनी पड़ी होंगी। फिर भले ही अमेरिका अभी भी यूरोप से ‘बहुत सारी’ दवा आयात करेगा।
भारत को क्यों रहना होगा सतर्क?
यह समझौता भारत के लिए कई महत्वपूर्ण सबक और चुनौतियां पेश करता है। यह दर्शाता है कि प्रमुख ग्लोबल अर्थव्यवस्थाओं के बीच संरक्षणवाद बढ़ रहा है। देश अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए टैरिफ और व्यापार धमकियों का उपयोग करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। भारत को अपनी निर्यात रणनीतियों और व्यापार समझौतों को इस बदलते सीन के अनुरूप ढालना होगा।
अगर अमेरिका और ईयू जैसे बड़े ब्लॉक द्विपक्षीय समझौतों पर फोकस करते हैं तो भारत को अपनी सप्लाई चेन को और अधिक लचीला और विविध बनाने की जरूरत होगी ताकि एक या दो प्रमुख बाजारों पर निर्भरता कम हो सके।
ये समझौता भारत को अपने खुद के मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) को तेजी से अंतिम रूप देने और मजबूत करने के लिए प्रेरित कर सकता है। विशेष रूप से उन देशों के साथ जो प्रमुख व्यापारिक भागीदार हैं ताकि भविष्य में संभावित व्यापारिक दबावों से बचा जा सके।
यह ग्लोबल ट्रेंड भारत को ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों के माध्यम से अपने स्वदेशी उत्पादन और आत्मनिर्भरता को और मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है ताकि वह बाहरी झटकों के प्रति कम संवेदनशील बने।





