‘मुझे घर में पहलवान, पठान और मोटी बिल्ली कहते थे’, आशा भोसले ने कहा था- उन्हें बुद्धि से कमजोर मानते थे सभी

हिंदी सिनेमा को सुरों से सजाने वाली आशा भोसले भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सदाबहार गाने हमेशा दर्शकों के दिलों में जिंदा रहेंगे। उनके साथ काम करने वाले लोगों का मानना है कि आशा ताई हमेशा चेहरे पर मुस्कान और दिल से प्यार देने वाली सिंगर्स में से एक थी, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आशा भोसले बचपन में बहुत शरारती थी और यही कारण था कि उनकी बहन लता मंगेशकर उन्हें घर में पहलवान और मोटी बिल्ली कहकर बुलाती थीं।
आशा भोसले और लता मंगेशकर के स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर था। जहां एक तरफ लता जी शांत और सुलझी हुई थीं, वहीं आशा चुलबुली और हमेशा खेल-कूदने वाली थी। वे स्कूल में इतनी शरारत करती थीं कि घर तक शिकायत पहुंच जाती थी। आशा भोसले को बचपन से ही गाने का शौक था और वे डेस्क पर बैठकर उंगलियों से तबला बजाती थी और उनके टीचर हमेशा शिकायत करते थे कि लड़की का मन पढ़ने से ज्यादा गाने-बजाने में लगता है।
आशा भोसले ने बताया था- बुद्धि से उन्हें थोड़ा कमजोर माना जाता था
आशा जी बचपन से खाना खाने और बनाने की शौकीन रही हैं और यही कारण है उनके यूएई, कुवैत, बहरीन, ब्रिटेन के बर्मिंघम और मैनचेस्टर में आशा नाम के रेस्तरां चलते हैं। खुद एक इंटरव्यू में सिंगर ने खुलासा किया था, उनका बचपन खाने और खेलने में निकला और उन्हें बुद्धि से थोड़ा कमजोर माना जाता था। मुझे घर का काम करना और रसोई में खाना पकाना बहुत पसंद था। मुझे घर में सभी पहलवान, पठान और मोटी बिल्ली के नाम से बुलाते थे।
आशा ने कहा था- मुझे बचपन में मलाई खाना बहुत पसंद था
सिंगर ने कहा था, ‘लता दीदी अपने अंदर सभी भावनाओं को छिपा लेती थीं, लेकिन मैं सबके सामने बोल देती थी। मुझे किसी से हिचक महसूस नहीं होती है। मुझे बचपन में मलाई खाना बहुत पसंद था और आज भी खाती हूं और खूब सारा दूध भी पीती हूं। यही कारण है कि आज तक मैं इसलिए गा पा रही हूं कि क्योंकि मैंने मलाई और दूध खूब सारा पीया है।’
आशा भोसले के घर काम करने वाली साल्वे बोलीं- मुझ गरीब को बहुत इज्जत दी
वहीं दिवंगत गायिका आशा भोसले के घर पर 40 वर्षों तक काम करने वाली सुनम साल्वे ने उन्हें जमीन से जुड़ा हुआ और अपने जैसी एक गरीब महिला को भी सम्मान देने वाला बताया। साल्वे ने कहा, ‘मैं उनके (आशा भोसले के) घर पर काम करती थी। उनका व्यवहार बहुत अच्छा था। उन्होंने मुझ जैसी एक गरीब महिला को, जो झुग्गी-झोपड़ी में रहती है, बहुत इज्जत दी। सफलता की ऊंचाइयों को छूने के बावजूद, वह हमेशा जमीन से जुड़ी रहीं। वह मेरे गांव भी आई थीं। जब भी मुझे छुट्टी की जरूरत होती थी, उन्होंने दी, कभी मना नहीं किया।’





